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आंध्र प्रदेश में ऑलिव रिडले कछुओं की मौत से चिंता | UPSC GS-3

 

आंध्र प्रदेश में ऑलिव रिडले कछुओं की मौत से बढ़ी चिंता

आंध्र प्रदेश में घोंसला बनाने के मौसम की शुरुआत के साथ ही ऑलिव रिडले समुद्री कछुओं की मौत की घटनाओं ने चिंता बढ़ा दी है। हाल ही में विशाखापत्तनम के पास कुछ समुद्र तटों पर इन कछुओं के शव पाए गए हैं, जिससे समुद्री जैव विविधता और संरक्षण प्रयासों पर सवाल खड़े हुए हैं।


ऑलिव रिडले कछुए: संक्षिप्त परिचय

ऑलिव रिडले समुद्री कछुआ (Lepidochelys olivacea) एक समुद्री सरीसृप है, जो अपनी सामूहिक घोंसला बनाने की अनोखी प्रक्रिया, जिसे अरिबाडा कहा जाता है, के लिए जाना जाता है।
भारत का पूर्वी तट, विशेष रूप से ओडिशा और आंध्र प्रदेश, इनके लिए महत्वपूर्ण घोंसला क्षेत्र माना जाता है।

ये कछुए आमतौर पर दिसंबर से अप्रैल के बीच रेतीले समुद्र तटों पर अंडे देते हैं।

संरक्षण स्थिति

  • IUCN रेड लिस्ट: असुरक्षित (Vulnerable)
  • वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972: अनुसूची-I (उच्चतम कानूनी संरक्षण)


आंध्र प्रदेश में हालिया घटना

घोंसला बनाने के मौसम की शुरुआत के दौरान, तीन वयस्क ऑलिव रिडले कछुओं के शव निम्न समुद्र तटों पर पाए गए:

  • मुथ्यालम्मापालेम
  • थंताडी
  • राजनापालेम (विशाखापत्तनम के पास)

इन घटनाओं ने वन्यजीव विशेषज्ञों और पर्यावरणविदों को सतर्क कर दिया है।


मौत का संभावित कारण: बायकैच (Bycatch)

ऑलिव रिडले कछुए हवा में सांस लेने वाले जीव हैं और उन्हें हर 40–45 मिनट में पानी की सतह पर आना आवश्यक होता है।

जब ये कछुए:

  • ट्रॉल या अन्य मछली पकड़ने के जाल में फँस जाते हैं
  • और समय पर सतह पर नहीं आ पाते

तो उनकी डूबने से मौत हो जाती है, जिसे बायकैच मृत्यु कहा जाता है।

यह समस्या खासकर प्रवास और घोंसला बनाने के मौसम में अधिक देखने को मिलती है।


कानूनी और नियामक चुनौतियाँ

विशेषज्ञों ने आंध्र प्रदेश समुद्री मछली पकड़ने विनियमन अधिनियम के सख्त पालन की आवश्यकता पर जोर दिया है।

मुख्य समस्या:

  • तटरेखा से 8 किलोमीटर के भीतर अवैध यांत्रिक मछली पकड़ना
  • यही क्षेत्र कछुओं की आवाजाही और घोंसला बनाने के लिए अत्यंत संवेदनशील होता है

कमजोर प्रवर्तन सीधे तौर पर समुद्री जैव विविधता के लिए खतरा बनता है।


नियोजित संरक्षण उपाय

घोंसला क्षेत्र और हैचरी

  • वन विभाग द्वारा:
  • चार घोंसला क्षेत्र
  • चार हैचरी
  • एनजीओ द ट्री फाउंडेशन के सहयोग से स्थापित की जाएँगी

प्रकाश प्रदूषण की समस्या

  • विशाखापत्तनम तट पर कृत्रिम रोशनी:
  • मादा कछुओं को घोंसला बनाने से रोक सकती है
  • नवजात कछुओं को समुद्र की बजाय गलत दिशा में भटका सकती है

उत्सव प्रबंधन

  • विशाखा उत्सव (23–31 जनवरी) के दौरान:

  • कछुओं को परेशान न किया जाए, इसके लिए विशेष सावधानियाँ
  • यह विकास और संरक्षण के संतुलन का प्रयास है

परीक्षा और नीति के लिए महत्व

  • जैव विविधता संरक्षण
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष
  • तटीय नियमन और सतत विकास
  • UPSC GS-3: पर्यावरण, पारिस्थितिकी और संरक्षण


निष्कर्ष

ऑलिव रिडले कछुओं की मौत की घटनाएँ यह दर्शाती हैं कि कानून, प्रवर्तन और जन-जागरूकता के बिना संरक्षण संभव नहीं है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो यह संकट भविष्य में और गहरा सकता है।


📌 Quick Facts (Exam Ready)

  • वैज्ञानिक नाम: Lepidochelys olivacea
  • घोंसला काल: दिसंबर–अप्रैल
  • IUCN स्थिति: Vulnerable
  • WPA, 1972: अनुसूची-I
  • प्रमुख खतरा: बायकैच + प्रकाश प्रदूषण

📝 UPSC GS-3 मॉडल उत्तर

(Environment / Biodiversity / Conservation)

प्रश्न: आंध्र प्रदेश में ऑलिव रिडले कछुओं की हालिया मौतों के कारणों और संरक्षण उपायों पर चर्चा कीजिए।


उत्तर: हाल ही में आंध्र प्रदेश के विशाखापत्तनम तट के पास घोंसला बनाने के मौसम की शुरुआत के साथ कुछ वयस्क ऑलिव रिडले समुद्री कछुओं की मौत दर्ज की गई है। यह घटना समुद्री जैव विविधता के संरक्षण को लेकर गंभीर चिंता उत्पन्न करती है।

ऑलिव रिडले कछुए (Lepidochelys olivacea) सामूहिक घोंसला बनाने की प्रक्रिया, जिसे अरिबाडा कहा जाता है, के लिए जाने जाते हैं। भारत का पूर्वी तट इनके प्रमुख घोंसला क्षेत्रों में शामिल है। ये कछुए हवा में सांस लेने वाले जीव हैं और उन्हें हर 40–45 मिनट में समुद्र की सतह पर आना आवश्यक होता है।

विशेषज्ञों के अनुसार, इन कछुओं की मौत का प्रमुख कारण मछली पकड़ने के जाल में फँसना (Bycatch) है। घोंसला बनाने और प्रवास के दौरान कछुओं की आवाजाही बढ़ जाती है, जिससे ट्रॉल जालों में फँसने की संभावना भी अधिक होती है।

इसके अतिरिक्त, तट से 8 किलोमीटर के भीतर अवैध यांत्रिक मछली पकड़ना, प्रकाश प्रदूषण और कमजोर कानून प्रवर्तन भी कछुओं के लिए खतरा बने हुए हैं। हालाँकि, वन विभाग द्वारा घोंसला क्षेत्रों और हैचरी की स्थापना जैसे संरक्षण उपाय प्रस्तावित किए गए हैं।


निष्कर्ष:
ऑलिव रिडले कछुओं का संरक्षण केवल कानूनों से नहीं, बल्कि प्रभावी प्रवर्तन, मछुआरों की भागीदारी और जन-जागरूकता से ही संभव है।


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