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माधव गाडगिल और जन-आधारित संरक्षण | Western Ghats | UPSC


 

माधव गाडगिल और जन-आधारित संरक्षण (People-Centred Conservation)

परिचय

माधव गाडगिल भारत के प्रमुख पर्यावरण वैज्ञानिक और विचारक थे। उन्होंने संरक्षण (Conservation) की ऐसी सोच दी, जिसमें प्रकृति के साथ-साथ लोगों को भी केंद्र में रखा गया

उनका मानना था कि:प्रकृति की रक्षा लोगों को हटाकर नहीं, बल्कि लोगों की भागीदारी से ही संभव है। उनका निधन 2026 में हुआ, लेकिन उनके विचार आज भी भारत की पर्यावरण नीति और संरक्षण बहसों को दिशा देते हैं।


पारंपरिक संरक्षण मॉडल की समस्या

पहले भारत में संरक्षण का मतलब था:

  • राष्ट्रीय उद्यान और वन्यजीव अभयारण्य
  • मानव गतिविधियों पर पूर्ण प्रतिबंध
  • लोगों को जंगल से बाहर करना

इसके दुष्परिणाम

  • आदिवासी और वनवासी अपराधी बन गए
  • पारंपरिक ज्ञान की अनदेखी हुई
  • सरकार और स्थानीय समुदायों के बीच टकराव बढ़ा


माधव गाडगिल का नया दृष्टिकोण

माधव गाडगिल ने इस सोच को बदला। उन्होंने कहा:

  • जंगल पर निर्भर लोग समस्या नहीं हैं
  • स्थानीय समुदाय प्रकृति के रक्षक हैं

  • संरक्षण को जोड़ना चाहिए:

    मानव अधिकार
  • आजीविका
  • लोकतांत्रिक भागीदारी

👉 इसे जन-आधारित संरक्षण (People-Centred Conservation) कहा जाता है।


जन-आधारित संरक्षण क्या है?

जन-आधारित संरक्षण का अर्थ है:

  • स्थानीय लोगों की भागीदारी से संरक्षण
  • निर्णय नीचे से ऊपर (Bottom-up) लेना
  • प्रकृति और समाज के बीच संतुलन बनाना

मुख्य विशेषताएँ

  • विकेंद्रीकरण
  • सामाजिक न्याय
  • पारिस्थितिक संवेदनशीलता


पश्चिमी घाट और WGEEP रिपोर्ट

पश्चिमी घाट का महत्व

  • विश्व के प्रमुख जैव-विविधता हॉटस्पॉट्स में से एक
  • खतरे:

    खनन
  • बाँध
  • शहरीकरण
  • जलवायु परिवर्तन

WGEEP (2011)

सरकार ने माधव गाडगिल की अध्यक्षता में
पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी विशेषज्ञ पैनल (WGEEP) बनाया।

प्रमुख सिफारिशें

  • बड़े हिस्से को पारिस्थितिक रूप से संवेदनशील क्षेत्र (ESA) घोषित करना
  • प्रदूषणकारी उद्योगों पर नियंत्रण
  • ग्राम सभा और स्थानीय निकायों की भूमिका बढ़ाना
  • पश्चिमी घाट पारिस्थितिकी प्राधिकरण की स्थापना


WGEEP रिपोर्ट का विरोध

WGEEP रिपोर्ट का विरोध इसलिए हुआ क्योंकि:

  • उद्योगों को नुकसान का डर
  • राज्यों को विकास रुकने की चिंता
  • राजनीतिक दबाव

परिणाम

  • कस्तूरीरंगन समिति द्वारा रिपोर्ट को कमजोर किया गया
  • अधिकांश सिफारिशें लागू नहीं हो सकीं

👉 यह विकास बनाम संरक्षण की वास्तविक चुनौती को दिखाता है।


राज्य और कानून पर गाडगिल की राय

माधव गाडगिल का मानना था कि:

  • पर्यावरण कानूनों का दुरुपयोग गरीबों के खिलाफ होता है
  • वन कानून आदिवासियों को अपराधी बना देते हैं
  • सरकारें उद्योगों को प्राथमिकता देती हैं

उनके अनुसार संरक्षण होना चाहिए:

  • न्यायपूर्ण
  • समावेशी
  • लोगों को सशक्त बनाने वाला


नीलगिरि बायोस्फीयर रिज़र्व में योगदान

माधव गाडगिल ने:

  • नीलगिरि बायोस्फीयर रिज़र्व की अवधारणा को आगे बढ़ाया
  • भारत के पहले बायोस्फीयर रिज़र्व के विकास में योगदान दिया

विशेषताएँ

  • मानव, वन और वन्यजीव का संतुलन
  • हाथियों और अन्य प्रजातियों की सुरक्षा
  • UNESCO के Man and the Biosphere Programme के अंतर्गत


माधव गाडगिल आज क्यों प्रासंगिक हैं?

उनके विचार महत्वपूर्ण हैं:

  • जलवायु परिवर्तन से निपटने के लिए
  • जैव-विविधता संरक्षण के लिए
  • आदिवासी और वन अधिकारों के लिए
  • सतत विकास के लिए
  • मानव-वन्यजीव संघर्ष कम करने के लिए

उनका स्पष्ट संदेश था:

पर्यावरण संरक्षण और मानव कल्याण एक-दूसरे से जुड़े हैं।


परीक्षा उपयोगिता (UPSC / BPSC)

  • GS Paper I – पश्चिमी घाट
  • GS Paper II – शासन और जनभागीदारी
  • GS Paper III – पर्यावरण, जैव-विविधता
  • निबंध – विकास बनाम पर्यावरण


क्विक रिविज़न पॉइंट्स

  • माधव गाडगिल → जन-आधारित संरक्षण के समर्थक
  • संरक्षण → लोगों की भागीदारी से
  • WGEEP → पश्चिमी घाट रिपोर्ट (2011)
  • नीलगिरि बायोस्फीयर रिज़र्व → समावेशी मॉडल


✍️ एक-पंक्ति परीक्षा नोट

माधव गाडगिल ने जन-आधारित संरक्षण की अवधारणा दी, जिसमें स्थानीय समुदायों को जैव-विविधता संरक्षण का केंद्र मानते हुए विकास और पर्यावरण के संतुलन पर ज़ोर दिया गया।

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