नीतीश कुमार: गाँव के इंजीनियर से बिहार के सबसे लम्बे समय तक मुख्यमंत्री
बाल्यकाल और पारिवारिक पृष्ठभूमि
नीतीश कुमार का जन्म 1 मार्च 1951 को पटना जिले के बख्तियारपुर अनुमंडल के कल्याण बिगहा गाँव में हुआ। पिता कविराज राम लखन सिंह स्वतंत्रता सेनानी रहे और आयुर्वेदिक चिकित्सा कर गाँव-गाँव घूमते थे। माता परमेश्वरी देवी घरेलू खेती-किसानी सम्भालती थीं। आर्थिक हालत मध्यमवर्गीय थी, पर घर में राष्ट्रीय चेतना और सामाजिक समरसता का माहौल था। बचपन से ही नीतीश को गाँव की गलियों में गाँधी-जयप्रकाश की कहानियाँ सुनने को मिलीं, जिन्होंने उनके अन्दर सार्वजनिक जीवन की चिंगारी भर दी।
स्कूली दिनों से राजनीतिक रुझान
प्रारंभिक पढ़ाई गणेश हाई स्कूल, बख्तियारपुर से हुई। वहीं वे छात्र संघ के महासचिव बने और 1971 के ‘संपूर्ण क्रांति’ आंदोलन में जयप्रकाश नारायण के संपर्क में आए। इंजीनियरिंग की पढ़ाई पटना के बिहार कॉलेज ऑफ इंजीनियरिंग (अब NIT पटना) से करते हुए वे युवा छात्र नेता के रूप में उभरे। 1972 में इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग की डिग्री लेने के बाद बिहार स्टेट इलेक्ट्रिसिटी बोर्ड में ट्रेनी इंजीनियर की नौकरी मिली, पर सरकारी दफ्तर की बंदिशों ने उन्हें अन्दर ही अन्दर खलने लगा। कुछ ही महीनों बाद उन्होंने राजनीति को पूर्णकालिक करियर चुना।
राजनीतिक करियर का पहला दशक (1977-1990)
- 1977: जनता पार्टी के टिकट पर हरनौत विधानसभा उपचुनाव लड़े, पराजित हुए।
- 1980: पुनः हरनौत से चुनाव, फिर हार। हार के बावजूद संगठन में मेहनत जारी रखी।
- 1985: लोकदल के प्रत्याशी के रूप में जीत दर्ज की; पहली बार विधायक बने।
- 1987: युवा लोकदल, बिहार के अध्यक्ष चुने गए।
- 1989: बाढ़ लोकसभा सीट से संसद पहुँचे; जनता दल का प्रदेश सचिव बनाए गए।
- 1990: वी.पी. सिंह सरकार में कृषि राज्य मंत्री (स्वतंत्र प्रभार) बने; संसद में सहकारिता, रेशम व खाद्य प्रसंस्करण जैसे विभाग सम्भाले।
समाजवादी जड़ों से लोकसभा तक
1991 में मंडल-कमंडल की उठापटक के बीच नीतीश ने पिछड़ों-अतिपिछड़ों के सशक्तिकरण को अपने एजेंडे का मुख्य धुरी बनाया। 1996 में वे बार-बार बाढ़ संसदीय क्षेत्र से जीतते रहे और रेल राज्य मंत्री बने। 1998-99 में अटल बिहारी वाजपेयी मंत्रिमंडल में रेल मंत्रालय सम्भाला। इसी दौरान उन्होंने ‘सेम्पूर्ण क्रांति’ के सहयोगी जॉर्ज फर्नांडिस के साथ ‘समता पार्टी’ बनाई, जो बाद में जनता दल (यूनाइटेड) में विलीन हुई।
2000: बिहार में राष्ट्रपति शासन और पहली बार मुख्यमंत्री
राबड़ी देवी सरकार के खिलाफ भ्रष्टाचार के आरोपों ने जनता का मोह भंग किया। 2000 के विधानसभा चुनाव में भाजपा-जद(यू) गठबंधन ने बहुमत लाया। 3 मार्च 2000 को नीतीश कुमार ने पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ ली। तब से लेकर आज तक वे आठ बार इस कुर्सी पर आसीन हो चुके हैं, जिससे वे बिहार के सबसे लंबे समय तक मुख्यमंत्री रहने वाले नेता बन गए हैं।
सुशासन के ब्रांड का उदय
नीतीश ने कानून-व्यवस्था को प्राथमिकता दी: फास्ट-ट्रैक कोर्ट, महिला थाने, कम्युनिटी पुलिसिंग और शराबबंदी जैसे कदम उठाए। सड़क-पुल बनवाए, स्कूलों में मिड-डे-मील में अंडा-दूध शामिल किया और लड़कियों को साइकिल वितरण योजना चलाई। इन योजनाओं से उन्हें ‘सुशासन बाबू’ की छवि मिली।
2013-15: महागठबंधन और जंगलराज-2 पर सवाल
2013 में भाजपा से अलग होकर नीतीश ने लालू प्रसाद यादव के साथ ‘महागठबंधन’ बनाया। 2015 का चुनाव जीतने के बाद वे फिर मुख्यमंत्री बने, पर सरकार चलाने में सामंजस्य की कमी और भाजपा के उभरते किलेबाज़ी के कारण 2017 में गठबंधन टूटा। उन्होंने फिर भाजपा से हाथ मिलाया और सत्ता बचा ली। इस ‘यू-टर्न’ ने उनकी ‘सुशासन’ छवि पर सवाल उठाए।
2020-25: सातवीं और आठवीं पारी
2020 का विधानसभा चुनान भाजपा-जद(यू) ने जीता, पर जद(यू) सीटें घट गईं। भाजपा ने उन्हें मुख्यमंत्री बनाया, लेकिन उप-मुख्यमंत्री तारकिशोर प्रसाद और रेणु देवी के ज़रिए अपनी पकड़ मजबूत की। 2022 में जातीय जनगणना करवाकर नीतीश ने फिर से पिछड़ा कार्ड खेला और भाजपा से नाता तोड़ा। अगस्त 2022 में ‘महागठबंधन 2.0’ बनाकर वे आठवीं बार मुख्यमंत्री बने।
नीति और योजनाएँ जिनसे उन्हें पहचान मिली
- बालिका साइकिल योजना (2006): कक्षा 9-12 की हर लड़की को साइकिल; स्कूल ड्रॉप-आउट दर 12 % से घटकर 2 % हुई।
- मुख्यमंत्री निश्चय योजना (2016): गाँव-शहर में पक्की गली-नाली, सौर स्ट्रीट-लाइट, वाई-फाई और युवाओं के लिए स्किल ट्रेनिंग।
- शराबबंदी (2016): बिहार को ‘ड्राई स्टेट’ घोषित किया; हालांकि तस्करी-माफिया पर अंकुश को लेकर आलोचना भी हुई।
- जल-जीवन-हरियाली (2019): जल स्रोतों के पुनर्जीवन और वृक्षारोपण पर ₹24,000 करोड़ की योजना।
- सात निश्चय-2 (2022): हर घर नल-जल, ग्रामीण सड़कों की कनेक्टिविटी, युवाओं को 10 लाख रोज़गार।
व्यक्तिगत जीवन और रुचियाँ
विवाह 22 फरवरी 1973 को मंजू कुमारी सिन्हा से हुआ; पुत्र निशांत कुमार। नीतीश सादगी, योग और सादे खाने के लिए जाने जाते हैं। सुबह की सैर, किताबें और गाँधीवादी साहित्य उनकी दिनचर्या का हिस्सा रहे हैं। वे कभी-कभी गाँव लौटकर खेतों में धान-गेहूँ की बुवाई करते हैं ताकि ‘ज़मीन से जुड़ाव’ बना रहे।
आलोचनाएँ और विवाद
- घोटाले: 2017 में शेल्टर होम (बालिका गृह) कांड ने महिला सुरक्षा पर सवाल खड़े किए; विपक्ष ने उन पर ‘मौन स्वीकृति’ का आरोप लगाया।
- शराबबंदी का साइड-इफेक्ट: कई बेगुनाहों की गिरफ्तारी, न्यायिक जाँच में पुलिस की ढिलाई पर उँगली उठी।
- ‘पलटू राम’ टैग: 2020-22 में दो बार गठबंधन बदलने से उनकी विश्वसनीयता पर तंज कसा गया।
राष्ट्रीय राजनीति में भविष्य?
2024 के लोकसभा चुनाव से पहले विपक्षी एकता की बैठकों में नीतीश कुमार का नाम प्रधानमंत्री पद के संभावित चेहरों में उछला। उन्होंने खुद को ‘PM मटेरियल’ कहकर चर्चा बढ़ाई, पर बाद में कहा, “मेरी प्राथमिकता बिहार है।” उनकी सबसे बड़ी ताकत ‘सामाजिक समीकरण’—कुर्मी-कोइरी, अतिपिछड़ा, महादलित और मुस्लिम—का समेटना है; कमजोरी कभी-कभी अति-सावधानी और तेज़ी से फैसला न ले पाना मानी जाती है।
सीखने वाली बातें
नीतीश कुमार की कहानी बताती है कि लगातार हार के बावजूद संगठन में जुटे रहना, जातीय समीकरणों को साधते हुए विकास को केंद्र में रखना और ‘ब्रांड बनाम ग्राउंड’ के बीच संतुलन बनाना—ये सब भारतीय राजनीति में दीर्घायु बनाए रखने के फॉर्मूले हैं। चाहे सुशासन की तारीफ हो या ‘पलटू’ तंज, बिहार की राजनीति में नीतीश कुमार एक बड़ा अध्याय बनकर रह गए हैं।
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