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अमेरिका के बाहर होने से ISA पर प्रभाव | International Solar Alliance


 

अमेरिका के बाहर होने से अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) पर क्या प्रभाव पड़ेगा?

जलवायु परिवर्तन और स्वच्छ ऊर्जा आज वैश्विक राजनीति और अर्थव्यवस्था के केंद्र में हैं। इसी संदर्भ में अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (International Solar Alliance – ISA) को भारत की सबसे सफल जलवायु कूटनीतिक पहलों में गिना जाता है।
हाल ही में संयुक्त राज्य अमेरिका द्वारा ISA सहित कई अंतरराष्ट्रीय संगठनों से बाहर निकलने की घोषणा ने यह प्रश्न खड़ा कर दिया है कि इसका ISA, भारत के सौर क्षेत्र और विकासशील देशों पर क्या प्रभाव पड़ेगा।

यह मुद्दा UPSC और राज्य PCS परीक्षाओं के लिए अंतरराष्ट्रीय संबंध, जलवायु कूटनीति और ऊर्जा सुरक्षा—तीनों दृष्टियों से अत्यंत महत्वपूर्ण है।


अंतरराष्ट्रीय सौर गठबंधन (ISA) क्या है?

ISA की स्थापना वर्ष 2015 में पेरिस जलवायु सम्मेलन (COP-21) के दौरान की गई थी।

प्रमुख तथ्य:

  • स्थापना: 2015
  • मुख्यालय: गुरुग्राम, भारत
  • नेतृत्व: भारत और फ्रांस
  • सदस्य देश: 120+ (अधिकांश ग्लोबल साउथ से)
उद्देश्य

  • सौर ऊर्जा को सस्ता बनाना
  • विकासशील देशों में सौर तैनाती बढ़ाना
  • वित्त जुटाना और निवेश जोखिम कम करना
  • क्षमता निर्माण और तकनीकी सहयोग

📌 ISA का मूल लक्ष्य यह है कि विकासशील देशों के लिए सौर ऊर्जा को व्यावहारिक और सुलभ बनाया जाए


अमेरिका ISA में कब और क्यों शामिल हुआ?

संयुक्त राज्य अमेरिका ने 2021 में अपेक्षाकृत देर से ISA की सदस्यता ली थी।
हालाँकि अमेरिका तकनीकी और वित्तीय रूप से एक बड़ा देश है, लेकिन ISA के भीतर उसकी भूमिका सीमित रही।

अब अमेरिका के बाहर होने से यह चिंता उठी है कि:

  • क्या ISA की फंडिंग प्रभावित होगी?
  • क्या भारत के सौर उद्योग पर असर पड़ेगा?
  • क्या अफ्रीका जैसे गरीब देशों को नुकसान होगा?


क्या अमेरिका के बाहर होने से ISA को वित्तीय झटका लगेगा?

संक्षिप्त उत्तर: नहीं, बड़ा झटका नहीं।

कारण:

  • अमेरिका का योगदान ISA की कुल निधि का लगभग 1% ही था।
  • ISA के अधिकारी स्पष्ट कर चुके हैं कि:
  • दैनिक कार्य जारी रहेंगे
  • प्रशिक्षण और क्षमता-निर्माण कार्यक्रम बंद नहीं होंगे
  • चल रही परियोजनाओं पर तत्काल प्रभाव नहीं पड़ेगा

👉 निष्कर्ष: वित्तीय दृष्टि से ISA अमेरिका पर निर्भर नहीं है।

📌 UPSC एंगल: यह दिखाता है कि ISA बहुपक्षीय लेकिन एक-देश-निर्भर संस्था नहीं है।


क्या इसका भारत के सौर क्षेत्र पर असर पड़ेगा?

व्यवहारिक रूप से बहुत कम।

1. भारत की सौर वृद्धि का आधार

भारत की सौर ऊर्जा वृद्धि मुख्यतः:

  • घरेलू मांग
  • राज्य विद्युत वितरण कंपनियों (DISCOMs)
  • SECI और NTPC जैसी केंद्रीय एजेंसियों

  • के दीर्घकालिक अनुबंधों पर आधारित है।

2. अमेरिका पर निर्भरता?

  • भारत सौर उपकरणों के लिए अमेरिका पर निर्भर नहीं है
  • वास्तविक वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में:

    सौर सेल निर्माण में चीन का वर्चस्व (~70%)
  • भारत ने अतीत में आयात चीन से किया है, अमेरिका से नहीं

3. भारत की विनिर्माण क्षमता

  • सौर मॉड्यूल: ~144 GW
  • सौर सेल: ~25 GW (तेजी से बढ़ रही)

👉 इसलिए अमेरिका के बाहर होने से:

  • परियोजनाएँ रुकेंगी नहीं
  • टैरिफ स्थिर रहेंगे
  • रोजगार पर नकारात्मक असर नहीं पड़ेगा


क्या भारत की सौर परियोजनाओं में निवेश धीमा पड़ सकता है?

संभावना कम है।

कारण:

  • भारतीय सौर क्षेत्र का वित्तपोषण:
  • घरेलू बैंक
  • वैश्विक ग्रीन फंड
  • बहुपक्षीय विकास बैंक
  • से आता है।
  • निवेशक मुख्यतः देखते हैं:

    नीति स्थिरता
  • मांग की विश्वसनीयता
  • भुगतान सुरक्षा

👉 इन तीनों मोर्चों पर भारत मजबूत स्थिति में है।

📌 परीक्षा संकेत: भारत की सौर अर्थव्यवस्था अमेरिका-निर्भर नहीं, नीति-निर्भर है।


वास्तविक आर्थिक जोखिम कहाँ है?

भारत में नहीं, बल्कि भारत के बाहर—विशेषकर अफ्रीका और गरीब विकासशील देशों में।

क्यों?

  • ISA की अधिकांश परियोजनाएँ:
  • अफ्रीका
  • छोटे द्वीपीय देश
  • निम्न-आय अर्थव्यवस्थाएँ
  • में केंद्रित हैं।
  • ये देश निर्भर करते हैं:

    सस्ते अंतरराष्ट्रीय ऋण
  • बहुपक्षीय सहयोग
  • जलवायु वित्त पर

अमेरिका के पीछे हटने का अप्रत्यक्ष असर

  • वैश्विक ऋणदाता अधिक सतर्क हो सकते हैं
  • परियोजना अनुमोदन धीमे पड़ सकते हैं
  • जोखिम-मूल्यांकन सख्त हो सकता है

👉 इससे गरीब देशों में सौर अपनाने की गति धीमी पड़ने का मध्यम जोखिम है।


भू-राजनीतिक और कूटनीतिक प्रभाव

ISA केवल एक ऊर्जा मंच नहीं, बल्कि भारत की जलवायु कूटनीति का प्रमुख उपकरण है।

भारत को क्या लाभ मिला?

  • ग्लोबल साउथ में नेतृत्व
  • भारतीय सौर कंपनियों के लिए नए बाजार
  • सॉफ्ट पावर और नॉर्म-सेटिंग

अमेरिका के बाहर होने से:

  • एक प्रभावशाली साझेदार कम हो जाता है
  • भारत और फ्रांस पर नेतृत्व का बोझ बढ़ता है
  • ISA की दिशा तय करने में भारत की भूमिका और गहरी होती है

📌 GS-2 लिंक: यह भारत की issue-based leadership को दर्शाता है।


क्या भारत के लिए कोई संभावित अवसर भी हैं?

हाँ, कुछ रणनीतिक अवसर।

यदि अमेरिका घरेलू राजनीति के कारण बहुपक्षीय मंचों से दूर रहता है, लेकिन:

स्वच्छ-ऊर्जा उपकरणों की मांग बनी रहती है

तो:

भारतीय सौर निर्माता निर्यात अवसर तलाश सकते हैं
वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में भारत की हिस्सेदारी बढ़ सकती है
हालाँकि यह:
व्यापार समझौतों
मानकों
टैरिफ नीतियों
पर निर्भर करेगा।

समग्र आकलन (Overall Assessment)

क्षेत्रप्रभाव
ISA की फंडिंगन्यूनतम प्रभाव
भारत का घरेलू सौर क्षेत्रलगभग अप्रभावित
भारत में निवेशस्थिर
अफ्रीका व गरीब देशमध्यम जोखिम
भारत की वैश्विक भूमिकानेतृत्व और जिम्मेदारी बढ़ी

निष्कर्ष

अमेरिका का ISA से बाहर होना कोई तात्कालिक झटका नहीं, बल्कि एक तनाव-परीक्षण है।
ISA की संस्थागत मजबूती बनी हुई है, भारत का सौर क्षेत्र स्थिर है, और भारत की जलवायु कूटनीति को अब अधिक नेतृत्व निभाने का अवसर और जिम्मेदारी दोनों मिले हैं।

UPSC और PCS परीक्षाओं के लिए यह मुद्दा दिखाता है कि कैसे:

  • जलवायु परिवर्तन
  • ऊर्जा सुरक्षा
  • अंतरराष्ट्रीय राजनीति

  • आपस में गहराई से जुड़े हुए हैं।

🔑 त्वरित पुनरावृत्ति बिंदु (Exam Ready)

  • ☀️ ISA: 2015, मुख्यालय गुरुग्राम, नेतृत्व भारत–फ्रांस
  • 🇺🇸 अमेरिका: 2021 में शामिल, योगदान ~1%
  • 💰 वित्तीय प्रभाव: न्यूनतम
  • 🇮🇳 भारत का सौर क्षेत्र: घरेलू मांग-आधारित, सुरक्षित
  • 🏭 विनिर्माण: मॉड्यूल ~144 GW, सेल ~25 GW
  • 🌍 जोखिम: अफ्रीका व गरीब देश
  • 🧭 रणनीति: भारत की जलवायु नेतृत्व भूमिका मजबूत

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